Consumer buying behaviour process in hindi 

Purchasing/पर्चेसिंग :- पहले हमने सीखा सेल्लिंग क्या है और आज हम सीखेंगे पर्चेसिंग क्या है , जिसको हिंदी में खरीदना भी कहा जाता है और खरीददारी आज के टाइम में कौन नहीं करता | यह एक आसान सा शब्द है और नार्मल हम सभी लोग रोज़मर्रा की जिंदगी में इसे यूज़ करते हैं |


अगर कोई व्यक्ति अपनी जरूरत के हिसाब से किसी वास्तु को पैसों के बदले मोल लेता है इसी मोल लेने की क्रिया को पर्चेसिंग (purchasing) कहा जाता है |

इसी क्रिया में माल (product) देने वाले या बेचनेवाला को सेलर(Seller) ,माल (product) लेने वाले या खरीदने वाले को बयर (Buyer) कहा जाता है |  

चलिए उद्धहरण से पर्चेसिंग को बारीकी से समझते हैं | मान लो करन घर में यूज़ होने वाली वस्तुएं खरीदने नज़दीक शहर में करियाना शॉप पे गया , अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीद उसने दुकानदार को बिल का भुगतान किया | वह ऑटो के ज़रिये से घर लौटता है |

  इस प्रकिरिया में दुकानदार ने वस्तुओं को सेल्ल (Sell) किया  और करन ने वस्तुओं की खरीददारी की | करन ने बयर (Buyer) की भूमिका निभाई और दुकानदार ने सेल्समेन की भूमिका निभाई  | फिर करन किसी ऑटो वाले की सर्विस को खरीद घर लौटा | 

1 . Habitual Buying Behavior (खरीदने की आदत)

2. Variety-Seeking Behavior (कस्टमर अलग अलग वैरायटी इस्तेमाल करना चाहता है )

3.  Dissonance Reducing Buying Behavior( तर्क करना ताकि बाद में पछतावा न हो)

4. Complex Buying Behavior (प्रोडक्ट खरीदने से पहले कंफ्यूज होता है)


1 . Habitual Buying Behavior (खरीदने की आदत) :-  इस तरह की खरीददारी में बयर पहले प्लानिंग नहीं  करते हम क्या -क्या खरीदेंगे | इस तरह की  खरीददारी के लिए ज्यादा सोचना नहीं पड़ता क्यूंकि इस केटेगरी के  प्रोडक्ट्स का प्राइस कम ही रहता है |कंस्यूमर की इनवॉल्वमेंट कम होती है | 

जैसे कि चॉकलेट ,दूध,आइस क्रीम,और भी खाने की वस्तुएं | इस तरह के प्रोडक्ट्स के ब्रांड्स में ज्यादा फर्क नहीं होता | 

 इस तरह के प्रोडक्ट्स के लिए कंपनी अपने ब्रांड्स को ज्यादा से ज्यादा टेलीविज़न या मीडिया प्लेटफार्म पे एड्स के जरिए दिखाती है रहती ताकि उनके प्रोडक्ट्स लोगों से कनेक्ट कर पायें जिससे उनकी सेल्स टर्न ओवर वढ़ती है | 

इस तरह की केटेगरी वाले प्रोडट्स को कंपनी हर प्लेटफॉर्म पे एड्स (ads) के ज़रिए से दिखाती है |

2. Variety-Seeking Behavior (कस्टमर अलग-अलग वैरायटी इस्तेमाल करना चाहता है ) :- इस तरह खरीददारी में बयर अलग -अलग तरह की वैरायटी खरीदता है |  खरीददारी में बयर प्रोडक्ट चेंज नहीं करता लेकिन उसी प्रोडक्ट की अलग - अलग वैरायटी को ट्री (Try) करता है |

इस तरह की केटेगरी के प्रोडक्ट्स के प्राइस में कोई ज्यादा अंतर नहीं होता लेकिन उनके ब्रांड्स में अंतर होता है | ऐसी खरीददारी में कंस्यूमर की इनवॉल्वमेंट कम होती है| 

ऐसे प्रोडक्ट्स बनाने वाली कंपनी अपने एक ही प्रोडक्ट को अलग - अलग फ्लेवर में प्रमोट करती है | ऐसे प्रोडक्ट्स को हमेशा डिस्प्ले में रखा होता है ताकि बयर तुरंत फैसला ले सके |

3.  Dissonance Reducing Buying Behavior( तर्क करना ताकि बाद में पछतावा न हो) :- इसमें कंस्यूमर की इन्वॉल्वमेंट ज्यादा होती है | ब्रांड्स में ज्यादा फर्क नहीं होता ,प्रोडक्ट महंगा होता है ,डेली परचेस नहीं होता कंस्यूमर खुद प्रोडक्ट को देखने परखने के बाद बय करता है | जैसे कि , कारपेट | 

कंपनी आफ्टर सेल सर्विस पे ध्यान देती है | 

4. Complex Buying Behavior (प्रोडक्ट खरीदने से पहले कंफ्यूज होता है) :- इस केटेगरी में आने वाला प्रोडक्ट महंगा होता है और डेली परचेस नहीं होता | इस केटेगरी में आने वाले प्रोडक्ट्स में रिस्क ज्यादा होता है |

 इन प्रोडक्ट्स के ब्रांड्स में ज्यादा फरक होता है | इसी लिए कंस्यूमर की इन्वोल्वमें ज्यादा होती है |

 जैसे मोबाइल ,लैपटॉप | ऐसी खरीददारी में कस्टमर/कंस्यूमर को अच्छे से प्रोडक्ट की नॉलेज लेनी चाहिए |  इस तरह के प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी अपने प्रोडक्ट्स के बारे कस्टमर को ज्यादा से ज्यादा नॉलेज प्रोवाइड करती है |


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